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Farmer Leader shekhar Dixit

Pt. Shekhar Dixit

Pandit Shekhar Dixit 

He born on 20 January 1984 is an Indian politician and social worker serving as the president of Rashtriya Kisan Manch.

He is one of the youth and young politicians in Uttar Pradesh. He is enthusiastic, morally sound, energetic, and diligent.

Since the age of 17, this man is creating differences in the political scenario of Uttar Pradesh and thriving success for farmers.

He is one of Uttar Pradesh's youngest farmer leaders and social workers.

He is honored with the presidentship of Rashtriya Kisan Manch. From a very young age, this youth and young politician in Uttar Pradesh has been raising awareness about the environmental problems and contributing to reducing the forest tribal issues by placing his voice directly into the mainstream debate.

Pandit Shekhar Dixit has been honored by several environmental and social departments such as India Brahmin Sabha for creating awareness and contributing to social and environmental matters.

He is a farmer’s leader who says, "In countries like Brazil and Switzerland, the public directly controls the government, so why not in India."

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  • कब मिलेगी भ्रष्‍ट मानसिकता से निजात | पं० शेखर दीक्षित
    सरकार के लाख जतन के बाद भी भ्रष्टाचार का समूल सफाया नहीं हो पा रहा। निसंदेह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार के प्रति सख्त हैं और आए दिन कड़ी कार्रवाई के मामले सामने आते रहते हैं फिर भी भ्रष्टाचार है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा। (आइटीआइ) को मान्यता देने के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ। प्रशिक्षण एवं सेवायोजन निदेशालय के अधिकारियों और कर्मचारियों ने बैंक गारंटी के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए मान्यता दे दी। Brahmin Leader Lucknow  शेखर दीक्षित जी का कहना है| मुख्यमंत्री पोर्टल पर ऐसे 59 संस्थानों की शिकायत दर्ज किए जाने के बाद जांच में 160 संस्थानों की बैंक गारंटी में गड़बड़ मिली। निदेशालय ने ऐसे संस्थानों के खिलाफ रपट कराने की शासन से अनुमति चाही है। एक तरफ मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के मसले पर जीरो टालरेंस की नीति पर चल रहे हैं, दूसरी तरफ अधिकारी-कर्मचारी गठजोड़ नियम-कायदों को धता बताकर मनमानी पर आमादा है। वजह साफ है कि भ्रष्टाचार की अमरबेल अभी भी फल-फूल रही है। ऐसा भी नहीं कि भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों को वेतन, सुख-सुविधा के मामले में सरकार कोई कोताही करती हो, बावजूद इसके सुविधा शुल्क उगाही की लत कुछ ऐसी है कि छूटने का नाम ही नहीं लेती। दरअसल, पिछली सरकारों में भ्रष्टाचार जिस कदर पनपा और परवान चढ़ा, योगी सरकार आने के बाद उम्मीद थी कि अब थमेगा।(Brahmin Leader Lucknow) मुख्यमंत्री ने स्वयं भी इच्छा शक्ति दिखाई। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन ही नहीं बल्कि बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई भी अमल में लाई गई। सोचने वाली बात है कि जिन संस्थानों पर नौजवानों को प्रशिक्षित कर उनका भविष्य संवारने की जिम्मेदारी है, उनकी नींव भ्रष्टाचारियों ने कितनी खोखली कर दी? वस्तुत: शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान अपने स्वार्थ साधने की खातिर युवजन के भविष्य के साथ खिलवाड़ सदैव से करते आ रहे हैं किंतु इन सब के बीच भ्रष्टाचारियों की संलिप्तता इनका काम आसान कर देती है। Brahmin Leader Luckow चिंताजन्य बात यह है कि हर बार सख्त कार्रवाई के बाद भी यह सिलसिला थमता क्यों नहीं? क्या गारंटी है कि पुलिस में रपट दर्ज कराए जाने के बाद सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा। वास्तव में भ्रष्टाचार एक ऐसी मनोवृत्ति है जो काफी गहरे तक घर कर गई है। भष्टाचार की मानसिकता में बदलाव आने तक निरंतर इसको झंझोड़ने और उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की जरूरत है।  
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  • जो किसान हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा | पं० शेखर दीक्षित

    Former Union Leader In Uttar Pradesh

    राष्ट्रीय किसान मंच (Former union leader in Uttar Pradesh) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित शेखर दीक्षित (Pandit Shekhar Dixit) बंद का समर्थन करते हुए कहा कि जो किसान हित की बात करेगा अब केवल वही देश पर राज कर पाएगा। उनका कहना था कि किसानों को लालीपाप पकडाकर व बहलाकर राज करने का जमाना चला गया है। देश में चल रहे शान्तिपूर्ण किसान आन्दोलन पर जिस प्रकार से सरकारों ने जुल्म किया है वह अब मंजूर नहीं है। Former union leader in Uttar Pradesh देश के किसी भी कोने में किसान पर जुल्म होगा तो पूरे देश का किसान एकजुट होकर उसका विरोध करेगा। पंडित शेखर दीक्षित जी  (Pandit Shekhar Dixit) का कहना है कि किसानों से बात कर उनकी परेशानी का हल निकालने की बजाए जिस प्रकार से किसानो को दोषी ठहराने की कोशिश हो रही है वह आने वाले समय में भारी पडेगी। उनका कहना है कि अन्नदाता जब कडाके की ठंड गर्मी और बारिश में खेत में काम करता है तब जाकर देश में लोगों को अन्न मिल पाता है इसलिए उसकी मेहनत का उपहास करना उचित नहीं है। सरकार को संजीदगी के साथ किसानों से वार्ता करके उनकी समस्या का हल निकालना चाहिए। पंडित शेखर दीक्षित जी (Pandit Shekhar Dixit) का कहना है कि सरकार जिस समर्थन मूल्य की घोषणा करती है उसका लाभ बिहार यूपी और एमपी के किसानों तक तो आज भी नहीं पहुच रहा है। धान का समर्थन मूल्य उत्तर प्रदेश में 1850 घोषित किया गया था पर 90 प्रतिशत किसानो ने 900 से 1100 तक के मूल्य पर धान को बेचना पडा है । तंत्र की यह खामी आज 74 साल में भी दूर नहीं हो सकी है। पंडित शेखर दीक्षित जी (Pandit Shekhar Dixit) ने बताया कि आज के इस आन्दोलन में यूपी एमपी व बिहार के किसान इसी कारण के चलते शामिल नहीं हुए हैं। इन राज्यों के किसानों ने आज तक समर्थन मूल्य के स्वाद को नहीं चखा है। इसी के कारण वह इसके लाभ व हानि को नही समझ पा रहे हैं। इसके विपरीत पंजाब व हरियाणा के किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता रहा है जिसके चलते वह आज न केवल बेहतर स्थिति में है बल्कि जागरूक भी है। उनका यह भी कहना है कि (Former union leader in Uttar Pradesh) सरकारों को अपनी कार्यप्रणाली को दुरुस्त करना पडेगा नहीं तो किसान की आमदनी दोगुनी करने की बात केवल दिवास्वप्र मात्र ही रह जाएगी।  
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  • आप से करते हैं हम एक अपील | पं० शेखर दीक्षित

    EK APPEAL APSE

     

    एक अपील आपसे ( EK APPEAL APSE ) देश में सबसे ज्यादा किसान भाई और परिवार हैं, पर वह ही सबसे ज्यादा परेशान है और सरकारी कुचक्र का शिकार है। देश में सभी वर्गों को तरक्की करने के लिए सरकारें तमाम सुविधाएं प्रदान करती है|

    परन्तु किसानों को नहीं क्यों? देश में जितनी भी योजनाएं बनती है उसमें सबसे ज्यादा योगदान किसानों का होता है,क्योंकि वह उन्हीं की जमीनों पर बनाया जाता है, पर क्या उनका लाभ किसानों को मिलता है?

    यूँ तो हम अन्नदाता है परन्तु सबसे ज्यादा पीड़ित भी हम ही है ऐसा क्यों?

    बडे़-बड़े उद्योगपतियों को हजारों करोड़ों का कर्ज माफी दी जाती है जबकि वह अपने उद्योगों से उससे कहीं अधिक कमाते हैं और किसानों को कर्ज माफी आपदा के समय भी नही दिया जाता क्या यह किसानों पर अत्याचार और दोगली नीति नही है?

    आज पूरे देश मे स्मार्ट सिटी बनाने की बात चल रही है परन्तु ‘‘स्मार्ट गाँव-खुशहाल गाँव” की नही क्यों?

    बिजली प्लान्ट हमारी जमीनों पर और बिजली शहरों और उद्योगपतियों के घर पर आखिर क्यों?

    मेडिकल कॉलेज हमारी जमीनों पर इलाज के समय हमारे परिवार बाहर क्यों?

    जब हम अन्न उपजाएं तो वह सस्ता और जब बाजार मे जाए तो वह महंगा क्यों?

    हम अपना अनाज सरकार द्वारा तय मूल्य पर ही बेंचें और बिचैलिया किसी भी भाव मे बेंचे क्या यह अन्याय नहीं?

    मेनहत हमारी, कर्ज हमारा, दर्द हमारा पर लाभ बिचैलियों का क्यों?

    N.S.S.O. का कहना है कि बीते 10 वर्षों मे 42 लाख करोड़ की कर छूट विभिन्न उद्योगो को दी परन्तु उद्द्योगों में उत्पादन नही बढ़ा और पर्याप्त सृजन में यह सदी विफल रही यदि 2 लाख करोड़ ही किसानों को प्रति वर्ष दिये जाते तो उसका सार्थक उपयोग होता लाखों रोजगारों का सृजन होता और देश खुशहाल होता, पर सरकारों ने ऐसा नही किया क्यों?

    पूरी जिन्दगी देश के लिए काम करने वाले और देश का पेट भरने वाले सभी किसानों को पेंशन नही क्यों?

    खाद महंगी, डी0 ए0 पी0 महंगी, पानी उपलब्ध नहीं, बिजली उपलब्ध नहीं फिर भी फसलें सस्ती ही रहें ऐसा क्यों?

    बीज महंगा, डीज़ल महंगा, नहीं महंगी तो मेहनत से उपजी किसान की फसल क्यों?

    किसानों के लिए चलायी जा रही, सरकारी योजनाएं भी भ्रष्ट सरकारी तन्त्र के कारण किसानों तक पहुँचती भी नहीं क्यों?

    एक अपील आपसे ( EK APPEAL APSE ) क्या सरकारों के लिए किसानो की कोई अहमियत नही? क्या सिर्फ चुनावों के समय ही किसान दिखता है? क्योकि हमारे बीच से ही चुनकर जाने वाला हम किसानों को भूलता है?

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  • किसान लीडर पंडित शेखर दीक्षित

    किसान लीडर पंडित शेखर दीक्षित

     

    जब तक आप किसान  ( Former Leader In Uttar Pradesh )होकर संगठित रहेंगे और अपने हक के लिए संघपरित रहेंगे तब तक दुनिया की कोई शक्ति आप का सुख चैन शक्ति और समृद्धि नहीं छीन सकती है |

    परन्तु जब आप जाति शीर्षक व धर्म शीर्षक की राजनीति में संलिप्त हो जायेंगे तब दुनिया की कोई ताकत आपके हितों की रक्षा नही कर सकती है |

    आप दुःखों के दलदल में धंस जायेंगे। इस लिए सदैव संगठित व संधारित रह कर किसान हित की बात करनी है ।

    किसानो  का ख्याल आते ही जे़हन में मैली कुचैली फटी बनियान, धोती पहने हुए युवक की तस्वीर दिलो दिमाग में छा जाती है। कभी आपने सोचा कि किसान इतना दुश्वारियों भरा जीवन क्यों जी रहे हैं ? (Kisan Neta Uttar Pradesh)

    आजादी के बाद सभी शहरो में विकास हुआ। खास कर महानगरों, नगरो व शहरों में जो कुछ भी चाहिए वह सब शहरों में उपलब्ध है शहरों में मॉल कल्चर तेजी से फैल रहा है।

    विलासिताओं भरा जीवन लोग जी रहे है या यूँ कहे कि गाँवो के विकास के लिए कोई ठोस कृषि नीति ही हम अभी तक नही बना पाये हैं।

    इसीलिए भारतीय किसान आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहा है।

    किसानों की जमीन से उन्हे बेदखल किया जा रहा है, पूँजीपतियों के साथ सरकार भी किसानों की जमीनों पर नज़रे जमाए है किसानों के हालात दिन ब दिन और भयावह होता जा रहे हैं।

    पूर्व प्रधानमंत्री मंत्री स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह जी ने गरीबों, मज़दूरो, किसानों के दर्द को बड़ी नज़दीकियों से समझा, उन्होंने संकल्प लिया की वे गरीबों, मज़दूरो, किसानों को बराबरी का दर्जा देने के लिए एक मुहिम चलायेंगे।

    परन्तु राजा साहब एक गंभीर बीमारी के चपेट में आ गये लेकिन राजा साहब ने हार नही मानी वे गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने के बाद भी मीटिंगों में पहुंचते थे परन्तु 27 नवम्बर 2008 में दिल्ली में राजा साहब का देहान्त हो गया।

    किसान, मज़दूरों, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राजा साहब के देहान्त का बड़ा धक्का पहुँचा। एक महान दर्शनिक ने सच ही कहा है कि बड़ी विभूतियों का देहान्त हो सकता है किन्तु उनके विचार युगों - युगों तक जीवित रहते है।

    राजा साहब के सपनों को साकार करने के लिए राष्ट्रीय किसान मंच को उत्तर प्रदेश का ही नही देश का सबसे बड़ा संगठन बना दिया अन्य राज्यों दिल्ली, पंजाब, हरियाण, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में भी संगठन ने गति ले ली है।

    राष्ट्रीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष (Kisan Neta Uttar Pradesh) भी निःस्वार्थ भाव से राष्ट्रीय किसान मंच को बुलंदियों पर पहुँचाने के लिए भारत भर मे जी जान से लगे हैं |

    लोगों को देश की सबसे बड़ी आबादी को खुशहाल करने की मुहिम में लगे है।

    इस किसान नेता (Former Leader In Uttar Pradesh) की सोच है कि भारत का किसान भी राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़े उसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा की बुनियादी जरूरतों का हक मिले।

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  • प्राकृतिक आपदा से त्रश्त किसानों को तुरंत राहत पहुंचाए सरकार | पं० शेखर दीक्षित
    बीते 15 दिनों से बेमौसम बारिश की मार झेल रहे किसानों के ऊपर शुक्रवार की भोर बारिश आफत बनकर बरस पड़ी। लखनऊ के आसपास के जिलों में तेज आंधी पानी के साथ ओलों की बारिश से किसान बर्बाद हो गया। खेतों में लगी सरसों, गेहूं कि साथ साथ दलहन और तिलहन की भी फसल को भरी नुक्सान हुआ है जिससे किसानों की फसल पूरी तरह चौपट हो गई। वही मवेशियों के लिए हरा चारा भी नष्ट हो गया। सुबह होते ही किसान अपनी बर्बादी को देखने खेतों की ओर निकल पड़े। (Young Politician In Uttar Pradesh ) कोई खेतों से पानी निकालने की जुगत कर रहा था, तो कोई बैठा आंसू बहा रहा था। कुदरत की यह मार शायद किसानों ने कभी नहीं देखी होगी। इसी बीच किसान मसीहा व किसानों के हमदर्द राष्ट्रीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. शेखर दीक्षित ने राज्य सरकार से मांग की है कि जल्द से जल्द किसानों की फसल का आकलन करा के उन्हें मुआबजा दिलाने का कार्य करें और सरकार से मांग है कि प्राकतिक आपदा से नष्ट हुई किसानों की फसलों को जल्द रहत पहुंचे जाये और जो भी जांच समिट गठित की जाये उस पर सभी प्रकार की वसूली पर रोक लगाई जाये जिससे नष्ट हुई फसल का पूरा -पूरा मुआवजा किसानों को मिल सके | पेड़ों से टूटकर जमीन पर बिछ गया आम का बौर भोर हुई ओलों की बरसात से जहां फसलों को नुकसान हुआ है, वही बागवानों की भी कमर टूट गई। आम के पेड़ों पर लदा बौर बड़े-बड़े ओलो के पड़ने से टूट कर जमीन पर बिखर गया। (Young Politician In Uttar Pradesh) सुबह बागवान बाग पहुंचे तो वहां का नजारा देख घबरा उठे। अबकी बार आम की अच्छी फसल होने की आस पूरी तरह टूट चुकी थी। बाराबंकी जिले के भयारा, मसौली, बड़ागांव, रामनगर, सहादतगंज, रामपुर समेत आम की बाग के ज्यादा क्षेत्रफल वाले इलाकों में भयंकर ओलावृष्टि हुई है। जिससे आम का उत्पादन भी इस बार ना के बराबर होने की कगार पर पहुंच गया है। चटाई हो गई रबी की सारी फसलें ओलावृष्टि से खेतों में खड़ी रबी की फसलें चटाई की तरह खेतों में बिछ गई। तेज आंधी पानी से गेहूं की बालियां टूट कर नीचे गिर गई। यही हाल सरसों का भी रहा। कई किसानों की खेतों में कटी पड़ी सरसों की फसल पर ओले पड़ने से सरसों खेत में बिखर गई, जो लगी हुई थी वह भी बर्बाद हो गई। ऐसे में किसान पूरी तरह से बर्बाद हो गया है। गिरी पड़ी फसल और ऊपर से भरा पानी मवेशियों के लिए चारे की भी समस्या खड़ी हो गई है। खेतों में लगी बरसीम बर्बाद हो गई। तलाबोर हुई आलू की क्यारियां होली का त्यौहार पड़ने से किसान आलू की खुदाई नहीं कर पाए थे। जैसे ही खुदाई का कार्य शुरू हुआ कि अचानक ओलों के साथ झमाझम बारिश हो गई। देवा, मसौली व फतेहपुर समेत कई क्षेत्रों में खेतों में खुदा पड़ा आलू पानी में डूब गया। (Young Politician In Uttar Pradesh ) कई खेत ऐसे दिखे जिनमें क्यारियों में पानी भरा हुआ था। किसानों का कहना है कि अब तक हुई बारिश में यह सब से आफत भरी बारिश हुई है। अब कोई फसलें सुरक्षित नहीं बचेगी। जो आलू भीग गया है वह अब सड़ जाएगा।
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  • देश के किसान की पूॅजीपतियो जैसी मदद क्यो नही करती सरकार | पं० शेखर दीक्षित
    किसान महामारी के दौर में भी अपने खेतो में काम कर देश के लिए अहम योगदान दे रहा हे जहां समूचा देश लॉकडाउन में अपने घ्ररो में रहने को मजबूर है
    वही किसान रात दिन गन्ना सप्लाई कर चीनी मिलो को संचालित कर रहा है
    ग्रामीण अंचल से दूध् सब्जी की आपूर्ति लगातार कर रहा है| Difference Between Industrialist And Businessman
    गेहूॅ की कटाई मडाई का कार्य लगातार संचालित है किसान तमाम बंदिशो के बाबजूद शहर की मंडियो में अपनी उपज पहुचा रहे है और आये दिन सुरक्षा बलो के उत्पीडन का शिकार हो रहा ऐसी दशा में आवश्यक हो जाता है कि किसानो को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य मिले लेकिन ऐसा हो नही रहा है
    आटे के मूल्य की तुलता में गेहूॅ का मूल्य बहुत कम है जिससे किसानो के बजाय बिचौलियो को लाभ मिल रहा है।
    इस पर राष्ट्रीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित शेखर दीक्षित ने  कहां कि देश के टाटा रिलायंस सहित तमाम कल कारखानेा में ताला लगा है
    किसान रात दिन खेतो में काम कर रहा है देश की करकार को किसानो को छोडकर लगता है सभी चिन्ता है
    जिन्दगी को दांव पर लगाकर किसान खेतो में काम कर रहे है किसान सरकार के साथ खडा है फिर भी सरकार किसानो को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं दे पा रही जबकि वर्तमान सरकार ने अपने घोषणा पत्र में कई बार यह कहा कि स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू कर किसानों को उसकी उपज का सही मूल्य दिया जाएगा |
    स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को उसकी मूल भावना के साथ लागू नहीं किया गया है,,न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP-Minimum Support Prices) का आधार सरकार ने ए2+पारिवारिक श्रम को जोड़कर बनाया है. वो इस पर 50 प्रतिशत का लाभ जोड़कर पैसा दे रही है,
    जो किसानों से किए गए वादे को पूरा नहीं करता।(Difference Between Industrialist And Businessman)
    असल में किसानों को सी2+50 प्रतिशत लाभ के फार्मूले से एमएसपी देने की जरूरत है,जिसमें खाद, पानी, बीज, दवा, मशीन की मरम्मत और उसके पारिवारिक श्रम आदि की भी लागत जुड़ती है।
    जो गेहूं सरकार द्वारा लागू किए गए फार्मूले से 1925 रुपये क्विंटल पर बिक रहा है उसका दाम ईमानदारी से सी-2 लागू होने पर 2765 रुपये के हिसाब से मिलेगा,, अभी एमएसपी का आकलन जैसे हो रहा है वो आर्थिक दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है,,यानी फसल का दाम सही तरीके से तय नहीं किया जा रहा।
    महज 6 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है,देश में सिर्फ 1.6 फीसदी बड़े किसान हैं,, बाकी लोग लघु एवं सीमांत में आते हैं,,, उनमें से ज्यादातर के पास सरप्लस अनाज नहीं होता इसलिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था का लाभ नहीं मिल रहा,,,, मुश्किल से गेहूं और धान के भी एक तिहाई भाग की ही खरीद एमएसपी पर हो पाती है।
     2017 के मुताबिक स्विट्जरलैंड सरकार अपने किसानों को सालाना प्रति हेक्टेयर 2993 यूरो यानी करीब 2.5 लाख रुपये खेती करने के लिए वजीफा के तौर पर देती थी,यानी एक लाख रुपये एकड़।(Difference Between Industrialist And Businessman)
    इसके साथ ही किसान अपना उत्पाद कहीं भी किसी भी रेट पर बेचने के लिए आजाद होता था,इसी तरह पशुपालकों को 300 यूरो यानी करीब 25000 रुपये मिलते थे।
    मैं भारत में भी इसी मॉडल पर किसानों को सालाना एक निश्चित रकम देने की मांग कर रहा हूं,,देश में 86 फीसदी लघु एवं सीमांत किसान हैं,, उन्हें 20 हजार रूपये एकड़, उससे बड़े वालों को 15 हजार रुपये एकड़ और 10 हेक्टेयर से अधिक खेती वालों को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ सरकारी मदद दी जाये , इससे किसानों की स्थिति में सुधार आ सकता है।(Difference Between Industrialist And Businessman)
    कैसे तय होती है एमएसपी
    किसानों को उनकी उपज का ठीक मूल्य दिलाने के लिए सरकार एमएसपी की घोषणा करती है,कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) इसका आकलन करता है,,इसे तय करने के तीन फार्मूले हैं।
    ए-2: कि‍सान की ओर से किया गया सभी तरह का भुगतान चाहे वो कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च जोड़ा जाता है।
    ए2+एफएल: इसमें ए2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेती में की गई मेहतन का मेहनताना भी जोड़ा जाता है।
    सी-2: लागत जानने का यह फार्मूला किसानों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है,
    इसमें उस जमीन की कीमत (इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट) भी जोड़ी जाती है जिसमें फसल उगाई गई,,इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है,,,इसमें कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है. यह लागत ए2+एफएल के ऊपर होती है।
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INTERVIEW

December 8, 2020

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Timeline

  • Birth

    Shekhar Dixit was born on 20 January 1984 to a Nawabi Hindu family of priests or pandits (Hindu scholars who learned Hindi philosophy, Sanskrit, and religion) in Nishantganj, Mahanagar, Lucknow.

    Year

    1984
  • Year

    2000
    Early career in Kisan Manch

    He had been associated with the Kisan Manch since 2000, at the age of 17, and remained connected with the organization.

  • Influenced By Mr. Vishwanath Pratap Singh

    In 2003, he started taking his political training under the guidance of former Prime Minister of India Mr. Vishwanath Pratap Singh (8th Prime Minister). He had taken training for more than 5 years in the early days of his journey.

    Year

    2003
  • Entry into politics

    In 2006, he was appointed as the coordinator for the Youth Kisan Manch for farmers of Uttar Pradesh. He studied, researched, and tackled many underlying issues that were becoming major problems for farmers during that time. At that time, he was under the guidance of and influenced by Mr. VP Singh to pursue a program called "Haq ki ladai" to create awareness among the people and farmers of Uttarakhand. In 2008, he was the main leading face in this Uttarakhand awareness program along with Mr. VP Singh, and more than lac farmers were influenced by Dixit to raise their voice for justice.

    Year

    2006
  • Awareness Program

    In 2008,he took the initiative for the awareness program in Uttar Pradesh along with Mr. VP Singh.

    Year

    2008
  • Representing Kisan Manch

    In 2010, he was able to make Kisan Manch reach the state level by his numerous efforts.

    Year

    2010
  • Presidentship of Kisan Manch

    In 2012, he was nominated with the responsibilities of state presidentship of Kisan Manch Uttar Pradesh and organized a rally for kisan jan jagran kisan manch.

    Year

    2012
  • Gao Chalo Unnao Chalo

    In 2013, Dixit participated in the various rally to gather the respect and support of farmers to demand a strong Lokpal, where Anna Hazare addressed this rally in Unnao district on February .The rally was based on the theme Gaon Chalo, Unnao Chalo. Both Dixit and Anna Hazare were trying to reach out to farmers and with the help of the presidentship of Kisan Manch, Dixit told the Indian Express that this particular rally will focus on various corruption issues.

    Year

    2013
  • Tanda NTPC event

    In 2014, Dixit has traveled and explored various regions of Uttar Pradesh and nearby areas . In the same year, he participated in the Tanda NTPC event that was an issue raised for the lands of farmers that were illegally occupying.

    Year

    2014
  • Movement for the rights of farmers

    He make a movement for the farmers to get subsidy for the loss they have suffer because of heavy hail storm, because of his efforts 20 lakh farmers benefited by this movement.

    Year

    2015
  • Support of Sheila dixit

    He supported Sheila Dixit for becoming the chief minister of Uttar Pradesh.

    Year

    2016
  • Protest against the government

    He raised his voice against the government for not providing the sugarcane payment.

    Year

    2017
  • Awarded By Honourable Rjyapal Ram Naik

    He was awarded by Hon Rjyapal Ram Naik for showing his unconditional support for farmers.

    Year

    2018
  • Spreading awareness among farmers

    He conducted many programs for spreading the awareness among farmers regarding the problems of parali.

    Year

    2019
  • Spreading awareness among farmers regarding covid

    Spreaded awareness between farmers regarding covid-19 to protect themselfs.

    Year

    2020

Political Influence

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